Thursday, November 17, 2011

कल्याण संसार

विचार, भावादि सब बाहर(बाह्य जगत) से ही अन्तस(अन्तर जगत) में आते हैं
हर किसी के। ये सारे अस्तित्व से आते हैं। इन्हें स्वास्तित्वगत मानना या
इन पर स्वामित्व का विचार या भाव भयंकर आध्यात्मिक भूल है। इसे
आध्यात्मिक चोरी या पाप भी कह सकते हैं।
इस पाप या भूल से मुक्त होने के दो मार्ग हैं- पहला: ध्यान साधना या
भक्ति भावना के द्वारा नित्य सुबह-शाम अस्तित्व को, शून्यास्तित्व को
इन्हें समर्पित करते रहना। दूसरा मार्ग है- साहित्याभिव्यक्ति।
'कल्याण संसार' के किसी साधक या साधिका को दोनों मार्गों या किसी एक
मार्ग पर नित्य गमन करना चाहिये। -अमृताकाशी 

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अमृताकाशी, PSN:06/ATAMPA, रचनाकार: "कृष्ण नहीं..." Blog:
http://krishna-naheen1506.blogspot.com

Tuesday, November 15, 2011

साहित्य रचना मातृभाषा में ही

संसार की किन्हीं भाषाओं को पढ़ना, समझना- यह किसी को करनी चाहिये, लेकिन
साहित्याभिव्यक्ति सिर्फ मातृभाषा में ही करनी चाहिये, क्योँकि
अनुभूतियों, संवेदनाओं तथा कल्पनाओं आदि का स्पष्ट प्रतिबिम्बन सिर्फ
मातृभाषा में ही सम्भव है। -अमृताकाशी

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Amritakashee, Writer: "Krishna Naheen (Hindi)" Blog:
http://krishna-naheen1506.blogspot.com

Monday, November 14, 2011

Creation-Destruction

"I am in favour of creation, whether I fail or succeed"- Agyatasheesh
"I am in favour of destruction, because every creations
have destructed by destructors, destructive elements"- Agnikendra
said. (from "Krishna Naheen")

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Amritakashee, Writer: "Krishna Naheen (Hindi)" Blog:
http://krishna-naheen1506.blogspot.com

Sunday, November 13, 2011

असुर और सुर

असुर हर कर्म को सुरविहीन ढंग से, बेढंग करते हैं और सुरों के हर
कार्यों में सरलता, सरसता, माधुर्य और सुर का समावेश रहता है।
-अज्ञाताशीष

Thursday, November 10, 2011

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आतम्पा के सारे व्यक्तित्व आदि काल से वर्तमान काल के सभी आध्यात्मिक गुरुओँ को एक साथ अपना शीश चढाते हैं। -अज्ञाताशीष